सोने की चिड़िया के नाम से प्रसिद्ध भारत देश को यूँ तो कई विदेशी आक्रमणकारियों ने लूटा, कई तो लूट कर सोना व् अन्य कीमती सामान अपने देश ले गए पर कई लूट करने के बाद भारत में ही बस गए और लोगों को गुलाम बना कर उनपर हुकूमत करने लगे।
उस काल में भारत की समृद्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी कई प्राचीन स्थलों में खुदाई के दौरान सोना व्र अन्य कीमती वस्तुएं मिलने के समाचार आते रहते हैं।
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में एक 800 साल पुराना जैन मंदिर है, जहां खुदाई के वक़्त मुगल कालीन खजाना मिलने की खबर आयी है।
इस मंदिर की दीवारें करीब-करीब 14 इंच तक मोटी हैं, खबर है कि इसी की एक दीवार को तोड़ने पर मिट्टी के कई घड़े मिले जिन्हें खोलने पर उनमे से हीरे मिले हैं। इनमे से कुछ घड़ों के अंदर सोना भी है।
जो 15 मजदूर यहां खुदाई का काम कर रहे थे, उन्होंने चुपचाप इसे आपस में ही बांट लिया था। मगर खज़ाना बाटने को लेकर उनमे झगड़ा हो गया और फिर ये मामला पुलिस तक जा पहुंचा। पुलिस ने जब इस दबे हुए खजाने की कुल कीमत के बारे में पता लगाया तो वो भी हैरान रह गई।
पुरे खजाने की कुल कीमत 15 लाख करोड़ के लगभग बतायी जा रही है। हालांकि ये खजाना कब का है और इस मंदिर में कहां से और कैसे आ गया, ये बात अब तक पता नहीं चल पायी है।
घटना की जानकारी मिलते ही एडीशनल एसपी कमल मौर्य घटना स्थल पर मुआयना करने पहुचे, जहां जांच करने पर सोने और चांदी के सिक्के मिले जिनपर उर्दू की इबारत और चित्र अंकित थे। पूछताछ करने पर एक स्थानीय जानकार ने कहा कि सिक्कों पर ‘शहंशाह अहमद’ अंकित है।
इंटरनेट द्वारा इस बात की प्रमाणिकता की जांच की गयी तब पता चला कि 14वीं शताब्दी के आसपास उस जगह पर शहंशाह अहमद का शासन हुआ करता था।
इतिहासकारों के मुताबिक़ ‘शेरशाह सूरी’ ने किसी जमाने में दक्षिण भारत की यात्रा करने के लिए रन्नौद से होता हुआ एक रास्ता बनवाया था। किताब ‘आईने अकबरी’ में भी शिवपुरी जिले के कोलारस, नरवर और रन्नौद का उल्लेख है। इसे देख कर ये मालूम होता है कि ये इलाके उस वक़्त कितने संपन्न हुआ करते थे।
रन्नौद, शिवपुरी जिले से करीब 60 किलोमीटर दूर कोलारस में बसा है और इसे ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इतिहासकार अरुण अपेक्षित के मुताबिक़ मोहम्मद घोरी, अलाउद्दीन खिलजी, बाबर और औरंगजेब जैसे कई मुगल आक्रमणकारियों की सेनाओं ने दक्षिण भारत पर हमले करने के दौरान यहां पड़ाव डाला था।
बाद में मुगल आक्रमणकारियों ने रन्नौद की जागीर पिंडारी भाइयों को सौंप दी थी, जो जैन धर्म के अनुयायी थे। करीब 200 वर्षों तक इस जागीर पर जैनियों का नियंत्रण रहा, तभी से उनके वंशज रन्नौद में रहते आये हैं। रन्नौद में कई बेहद प्राचीन मंदिर, मठ, मस्जिदें व् दरगाहें हैं।
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